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मन की चतुराई और सावधानी का महत्व

 मन का कार्य है मनन करना संकल्प विकल्प करना किसी भी विषय को लेकर के उसमें डूबना। इसका स्वभाव है कोई बात पकड़ लेगा, कोई दृश्य पकड़ लेगा, कोई विषय पकड़ लेगा और यह इतनी चतुराई से उपासक को डुबा देता है। यह बहुत सावधानी का विषय है।


वह पहले विश्वास दिलाता है, "नहीं, ऐसा नहीं होगा। मैं ऐसा नहीं करने दूंगा। बस तुम छू लो, तुम देख लो, बस तुम संग बैठ लो।" और फिर धीरे-धीरे आपको फंसाता है।


फिर आप पछताते हैं कि ऐसा क्यों हो गया। प्रत्येक चेष्टा में इसका कार्य है उस विषय का मनन करके उसकी संपूर्णता को संकल्प रूप में बदल देना और उसको चेष्टा में उतार देना।


और इतना कहने में समय ज्यादा लगता है, लेकिन उसको करने में नहीं। यह तुरंत कर देता है और उपासक को समय नहीं 

देता।


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